ऑटोमैटिक फिटनेस जांच इकाइयों की दैनिक जांच क्षमता 167 वाहनों की थी, लेकिन 2020-21 में औसत मात्र 24 वाहनों की जांच तक सीमित रहा। इसके अलावा, 60% फिटनेस प्रमाणपत्र ऐसे वाहनों को जारी किए गए, जिनकी उत्सर्जन जांच की ही नहीं गई थी।
रिपोर्ट के अनुसार, राजधानी में प्रति वर्ष 4.1 लाख वाहनों की फिटनेस जांच की क्षमता होने के बावजूद, केवल 12% जांच स्वचालित फिटनेस केंद्रों पर की गई। शेष जांच मैनुअल केंद्रों पर हुई, जहां निरीक्षण मुख्य रूप से दृश्य आकलन पर आधारित था। यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से अपर्याप्त थी और निरीक्षण अधिकारी की व्यक्तिगत राय पर निर्भर थी। दूसरी ओर, ऑटोमैटिक फिटनेस जांच में वाहन के उत्सर्जन स्तर, ब्रेकिंग सिस्टम और अन्य तकनीकी पहलुओं की सटीक जांच होती है, जो प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवश्यक है।
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रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि 2014-15 से 2018-19 के दौरान फिटनेस जांच के लिए बड़ी संख्या में वाहन जांच के लिए प्रस्तुत नहीं हुए। 2018-19 में 64 फीसदी वाहन फिटनेस जांच से बाहर रहे। इसके बावजूद इन वाहनों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। यह भी पता चला है कि ऑटोमैटिक फिटनेस जांच इकाइयों की क्षमता प्रतिदिन 167 वाहनों की जांच करने की थी, लेकिन 2020-21 में औसत केवल 24 वाहनों की जांच हुई। साथ ही, 60 फीसदी फिटनेस प्रमाणपत्र उन वाहनों को जारी किए गए जिनकी उत्सर्जन जांच ही नहीं की गई थी।
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फिटनेस जांच के लिए वाहनों की अनुपस्थिति और प्रशासनिक लापरवाही
प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (पीयूसी) जारी करने में गंभीर अनियमितताएँ सामने आईं। रिपोर्ट के अनुसार, 10 अगस्त 2015 से 31 अगस्त 2020 के बीच 22.14 लाख डीजल वाहनों की जांच की गई, लेकिन 24% वाहनों के उत्सर्जन मूल्य दर्ज ही नहीं किए गए। इसके अलावा, 4,007 डीजल वाहनों को अनुमत सीमा से अधिक उत्सर्जन करने के बावजूद पीयूसी जारी कर दिया गया। कुल 65.36 लाख वाहनों को पीयूसी दिया गया, लेकिन 1.08 लाख वाहन, जो कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन की निर्धारित सीमा से अधिक उत्सर्जन कर रहे थे, उन्हें भी प्रमाणपत्र मिल गया। 7,643 मामलों में एक ही समय पर एक से अधिक वाहनों की जांच दर्शाई गई, जो व्यावहारिक रूप से असंभव है। वहीं, 76,865 मामलों में जांच और प्रमाणपत्र जारी करने की पूरी प्रक्रिया महज एक मिनट में पूरी कर दी गई, जो तकनीकी रूप से संभव नहीं है।
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पीयूसी जारी करने में अनियमितताएं
प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (पीयूसी) जारी करने में भी भारी अनियमितताएं बरती गईं। रिपोर्ट में बताया गया है कि 10 अगस्त 2015 से 31 अगस्त 2020 के बीच 22.14 लाख डीजल वाहनों की जांच हुई, लेकिन 24 फीसदी वाहनों के लिए जांच मूल्य दर्ज नहीं किए गए। 4,007 डीजल वाहन जिनके उत्सर्जन मूल्य अनुमत सीमा से अधिक थे, तब भी पीयूसी जारी किए गए। 65.36 लाख वाहनों को पीयूसी जारी किया गया, लेकिन 1.08 लाख वाहन, जो कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन की निर्धारित सीमा से अधिक उत्सर्जन कर रहे थे, उन्हें भी पीयूसी जारी किया गया। 7,643 मामलों में एक ही समय पर एक से अधिक वाहनों की जांच दिखाई गई, जो व्यावहारिक रूप से असंभव है। वहीं, 76,865 मामलों में जांच और प्रमाणपत्र जारी करने में केवल एक मिनट का समय लगा, जो तकनीकी रूप से संभव ही नहीं है।
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